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Bihar Election 2020 जानिये चुनावी दंगल में उतरे ये बड़े

Bihar Election 2020: जानिये चुनावी दंगल में उतरे ये बड़े लड़ाके कैसे अपने विरोधियों को देते हैं मात…

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चुनावी दंगल की हर लड़ाई उम्मीदवारों के लिए इम्तहान की घड़ी होती है। जनता का भरोसा जीतना और उनका मत प्राप्तकर सेवा का मौका पाना बड़ी बात होती है। पर इस चुनावी दंगल में ऐसे बहुतेरे लड़ाके हैं, जिन्हें कई दफे जनता ने अपने भरोसे से नवाजा है। कोई पांच तो कोई आठ , दस और ग्यारह बार तक मैदान में उतर चुके हैं। देखना दिलचस्प होगा इनमें से कौन-कौन फिर जनता का दिल जीत पाते है। आइए जानते हैं इन बड़े लड़ाकों के बारे में …

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1- जीतन राम मांझी:  

विस क्षेत्र: इमामगंज (सुरक्षित)

लड़े: 9 बार
जीते: 6 बार

जीत के कारण 
इमामगंज सुरक्षित सीट से जीतनराम मांझी जातीय समीकरण में पूरी तरह फिट बैठते हैं। मांझी की बड़े नेता की छवि है। सूबे के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। कोई बड़ा स्थानीय विवाद नहीं। स्थानीय भाषा में बात कर लोगों को रिझा लेते हैं। ऐसा लगता है मानो अपने घर का कोई बैठा हो। समस्याओं को अधिकारियों तक पहुंचाने में नहीं चूकते। लोग जानते और मानते भी हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इनकी नजदीकी रही है। आठ बार में नौ स्थानों से चुनाव लड़े। गया में फतेहपुर, बाराचट्टी, बोधगया, मखदुमपुर, इमामगंज आदि विधानसभा क्षेत्रों से श्री मांझी चुनाव लड़ चुके हैं।

2- बिजेन्द्र प्रसाद यादव

विस क्षेत्र: सुपौल
लड़े: 7 बार
जीते: 7 बार

जीत के कारण 
सुपौल विधानसभा से जदयू प्रत्याशी व मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव लगातार सात बार जीत रहे हैं। इनकी छवि बेदाग रही है। इनके कार्यकाल में सुपौल में बिजली और सड़क के क्षेत्र में काफी सुधार हुआ। लोगों को जहां भरपूर बिजली मिलने लगी वहीं अच्छी सड़क मिलने से आना-जाना आसान हुआ। व्यापार को भी बढ़ावा मिला। जनता के बीच इनकी अच्छी छवि बनी। परिसीमन ने भी इनको लाभ पहुंचाया। परिसीमन में मरौना प्रखंड को सुपौल विधानसभा क्षेत्र में शामिल कर दिया गया। मरौना यादव बहुल इलाका है। इससे इनकी जीत की राह आसान हो गयी। साथ ही इनको गठबंधन की राजनीति का लाभ भी मिलता रहा है। इनके खिलाफ अभी तक महागठबंधन की ओर से प्रत्याशी घोषित नहीं किया गया है।

3- प्रेम कुमार

विस क्षेत्र: गया टाउन
लड़े: 7 बार
जीते: 7 बार

जीत के कारण 
भाजपा से आठवीं बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे मिलनसार स्वभाव के प्रेम कुमार किसी से भी बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। गया के एक दुकानदार बताते हैं कि उन्होंने दुकान खोली तो उद्घाटन में प्रेम कुमार को बुलाया और वो टाइम पर चले आए। लोग बताते हैं कि वो आपकी बातें सुनेंगे जरूर। समस्या का समाधान हो या नहीं अधिकारियों को फोन कर उसे सुलझाने को कहेंगे। एक जानकार बताते हैं कि कई बार इनका विरोध होता है। लेकिन वो विरोधियों को भी प्यार से समझाते हैं। चुनाव के अंतिम दिन में लोग इनके समर्थन में आ जाते हैं। कई बार रातों रात फैसला बदल जाता है और जो विरोध में होते थे वे भी साथ हो गये। क्षेत्र में विकासात्मक योजनाओं का कार्यान्वयन भी हुआ है। समाज के हर वर्ग में पैठ है।

4- उदय नारायण चौधरी

विस क्षेत्र: इमामगंज (सुरक्षित)
लड़े: 7 बार 
जीते: 5 बार

जीत के कारण
इमामगंज की सुरक्षित सीट इनके जातीय समीकरण के लिहाज से अच्छी मानी जाती है। सुरक्षित सीट के हिसाब से बड़े नेता हैं। प्रदेश स्तर पर इनकी पहचान है। अपने सहज बोलचाल से जल्द ही आम लोगों को प्रभावित कर लेते हैं। दांगी समाज में अच्छी पकड़ है। लोग बताते हैं कि किसी का भी फोन जाने पर काम करवाने की कोशिश करते हैं। क्षेत्र में सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों को दिलवाने की कोशिश करते हैं। अब तक सात बार चुनावी मैदान में उतर चुके हैं जिनमें से पांच बार इन्हें जीत मिली है। राजनीति का लंबा अनुभव है।

4- अरुणा देवी

विस क्षेत्र: वारिसलीगंज
लड़ी: 5 बार
जीते: 3 बार

जीत के कारण
जिले में सरदार कहे जाने वाले अपने पति अखिलेर्श ंसह का साथ अरुणा देवी को मिलता रहा है। पहली बार में निर्दलीय ही उनकी सफलता उनके प्रति उनके अपने लोगों का महज एक लगाव भर था। प्रतिद्वंद्वी प्रदीप कुमार के कारण तीन बार विधायक बन चुकीं अरुणा देवी की जीत का सिलसिला बीच में दो बार टूट गया। इस बार प्रदीप कुमार की पत्नी आरती देवी पति का मोर्चा संभालने अरुणा देवी के सामने हैं। 

5- अरुण कुमार

विस क्षेत्र: काराकाट
लड़े छह बार
जीते तीन बार

जीत के कारण
काराकाट में माले के उम्मीदवार अरुण कुमार पिछले छह  चुनाव में लगातार यहां से खड़े हो रहे हैं। तीन चुनाव में जीत भी मिली। काराकाट कुशवाहा बहुल इलाका होने का लाभ अरुण कुमार को मिला है। कम्युनिस्ट पार्टियों का प्रभाव भी काराकाट में रहा है। इसमें काराकाट के साथ बिक्रमगंज व संझौली प्रखंड का पूरा क्षेत्र आता है। पूर्व में माओवादी विचारधारा को ले यह क्षेत्र राज्य स्तर पर चर्चा में रहा है।

6- राजेश्वर राज

विस क्षेत्र: काराकाट
लड़े: पांच बार
जीते:   दो बार

जीत के कारण
सासाराम से छह बार चुनाव लड़ने वाले डॉ. अशोक कुमार ने इस बार राजद को छोड़ जदयू का दामन थाम लिया है। जदयू के टिकट पर उतरने के बावजूद अपने द्वारा किए गए कार्यों की बदौलत अशोक कुमार जीत का दावा करते हैं। सासाराम में कुशवाहा जाति की बहुलता होने का लाभ अशोक कुमार को मिलता रहा है। हालांकि क्षेत्र में सड़क, पेयजल के मुद्दे पर किए गए कार्य को विधायक अपनी उपलब्धि बताते हैं। 

7- डॉ. अशोक कुमार

विस क्षेत्र: सासाराम
लड़े: छह बार
जीते:   दो बार

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जीत के कारण
सासाराम से छह बार चुनाव लड़ने वाले डॉ. अशोक कुमार ने इस बार राजद को छोड़ जदयू का दामन थाम लिया है। जदयू के टिकट पर उतरने के बावजूद अपने द्वारा किए गए कार्यों की बदौलत अशोक कुमार जीत का दावा करते हैं। सासाराम में कुशवाहा जाति की बहुलता होने का लाभ अशोक कुमार को मिलता रहा है। हालांकि क्षेत्र में सड़क, पेयजल के मुद्दे पर किए गए कार्य को विधायक अपनी उपलब्धि बताते हैं। 

8- प्रदीप जोशी

विस क्षेत्र: डेहरी
लड़े: पांच बार
जीते: एक  बार

जीत के कारण
डेहरी से पांच बार चुनाव लड़ने वाले प्रदीप जोशी एक बार फिर राष्ट्र सेवा दल के प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं।  डेहरी विधानसभा में हिन्दुत्व का मुद्दा उठाकर लोगों का समर्थन हासिल करने वाले प्रदीप जोशी 2005 में विधायक बने। हिन्दुत्व के अलावा प्रदीप जोशी डेहरी व अकोढ़ीगोला में अपने द्वारा किए गए कार्यों को जीत का आधार बताते हैं। आम लोगों की शिकायतों के समाधान का प्रयास करते हैं।

9- सुरेन्द्र यादव

विस क्षेत्र: बेलागंज
लड़े: सात बार
सात: बार सात बार

जीत के कारण
चुनावी लड़ाई में शत प्रतिशत जीत का रिकॉर्ड रखनेवाले सुरेंद्र यादव की अपने क्षेत्र के लोगों में अच्छी पकड़ है। स्थानीय स्तर पर इन छवि दबंग की मानी जाती रही है। हालांकि, लोगों से जुड़ाव रहता है। जो उन्हें जानते हैं उनका कहना है कि आम लोग आसानी से अपनी बात और समस्याएं उनतक पहुंचा पाते हैं। लोगों के बीच के बड़े से बड़े विवाद को बैठाकर सुलझा देना इनकी खास कला है। लोग इनकी बात मानते हैं और सुनते भी हैं। एमवाई का समीकरण भी इनके पक्ष में रहता है।  जरूरतमंद लोगों की मदद करने को ये हमेशा तैयार रहते हैं। इसलिए इनका सात बार चुने गये हैं।

10- नंदकिशोर यादव

विस क्षेत्र: पटना साहिब
लड़े: छह बार
जीते: छह बार

जीत के कारण 
पटना साहिब विधानसभा क्षेत्र से नंद किशोर यादव सातवीं बार चुनाव मैदान में हैं। 2020 चुनाव में पार्टी ने पटना साहिब विधानसभा क्षेत्र में उनके ऊपर एक बार फिर भरोसा जताया है। नंद किशोर यादव 1995 में पहली बार बिहार विधानसभा में विधायक बनकर पहुंचे थे। तब पटना साहिब सीट पटना पश्चिम के नाम से जानी जाती थी। उनकी लगातार जीत में जातीय समीकरण और भाजपा का वोट बैंक हमेशा मददगार साबित होता है। यहां वैश्य और कुशवाहा की अच्छी आबादी है। इसके अलावा ज्यादातर समय विपक्षी उम्मीदवार बाहरी होता है। इसका फायदा भी मिलते रहा है। 

11- नरेंद्र नारायण यादव

विस क्षेत्र: आलमनगर
लड़े: छह बार
जीते: छह बार

जीत के कारण 
मधेपुरा के आलमनगर विधानसभा से 1995 से छह बार जीत चुके हैं जदयू प्रत्याशी व विधायक नरेंद्र नारायण यादव। उनकी जीत में हर जाति-धर्म के लोगों तक सीधी पहुंच को बड़ा कारण माना जाता है। दुख-सुख के मौके पर लोगों के घरों तक पहुंचना और सहजता के कारण लोग अपनी बातों को उनके सामने बेझिझक रखते हैं। जनता की नाराजगी को भी वे सहज स्वीकार करते हैं। इस कारण कोई प्रत्याशी अबतक उनके सामने टिक नहीं पाए हैं। वे लगातार छह बार से आलमनगर विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित होते आ रहे हैं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास कार्य भी किए हैं।

12- कौशल यादव

विस क्षेत्र: हिसुआ
लड़े: छह बार
जीते: चार बार

जीत के कारण
युवा कांग्रेस से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले कौशल यादव युवाओं पर खासी पकड़ रखते हैं। इसके अलावा क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक समझ भी उनके राजनीतिक कौशल को हमेशा से तराशती रही है जिसके बूते वह चार बार विधानसभा पहुंच सके हैं। अपने विधायक पिता युगल किशोर्र ंसह यादव और विधायक माता गायत्री देवी की राजनीतिक विरासत संभालने में जुटे चार बार विधायक रह चुके कौशल यादव वर्तमान में जिले की राजनीति की एक प्रमुख धूरी हैं। यही कारण है कि उनके नाम पर ही उनकी पत्नी पूर्णिमा यादव भी चार बार विधायक रह चुकी हैं।

13- सुदामा प्रसाद

विस क्षेत्र: तरारी
लड़े: छह बार
जीते:  एक बार

जीत के कारण 
आईपीएफ व भाकपा माले से राजनीति करने वाले सुदामा प्रसाद को पांचवीं बार विधानसभा चुनाव मैदान में उतरने पर पिछले चुनाव में पहली बार सफलता मिली। तब उन्हें तरारी विस क्षेत्र से त्रिकोणात्मक संघर्ष का लाभ मिला। पूर्व में वे तीन बार आरा व एक बार जगदीशपुर विस क्षेत्र से चुनावी अखाड़े में उतरे पर इन क्षेत्रों में कांटे के मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा था। जमीनी संघर्षों व आंदोलनों से पहचान बनाने के अलावा स्वजातीय वोटरों में भी पैठ होने के चलते ही तीन विस क्षेत्रों में चुनाव लड़े। आरा विस क्षेत्र में दो बार तो दूसरे स्थान पर रहे थे।

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14- रमई राम

विस क्षेत्र: बोचहां
लड़े: 11 बार
जीते: 9 बार

जीत के कारण 
रमई राम दलितों और पिछड़ों के नेता माने जाते रहे हैं, लेकिन इनको समाज के प्राय: सभी वर्गों से समर्थन मिलता रहा है। मंत्री पद पर रहते हुए भी अपने क्षेत्र का भ्रमण करते रहे हैं। एक बार हाजीपुर से लोकसभा का चुनाव लड़े और हार गए। राजद और जदयू में रहे हैं। फिलहाल राजद से चुनाव लड़ रहे हैं। इनकी जीत के कारणों में चुनावी व जातीय समीकरण रहा है। इनके समाज का वोट चाहे ये किसी भी दल में हों इनको मिलता रहा है। राजनीति में लंबी पारी खेल चुके हैं और चुनाव में मतदाताओं का मूड मिजाज किस ओर है यह भांप जाते हैं। कई बार आखिरी पलों में भी अपनी कुशलता से बाजी पलट देते रहे हैं।

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15- रामविचार राय

विस क्षेत्र: साहेबगंज
लड़े: आठ बार
जीते: चार बार

जीत के कारण 
राजद में रहे हैं। अभी राजद के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं। पिछली बार चुनाव जीते। उसके पहले राजग की लहर में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। स्वजातीय वोट पर इनकी पकड़ मजबूत रही है। क्षेत्र में इनकी छवि मजबूत रही है। लोगों के आपसी विवाद को सुलझाने और सरकारी योजनाओं का अपने मतदाताओं को लाभ दिलाने में तत्पर रहते हैं। क्षेत्र के लोगों से इनका संपर्क हमेशा रहा है। स्थानीय भाषा में बात करते हैं जो लोगों को पसंद आता है। समस्याओं के निदान के लिए जनता के सामने अधिकारियों तक पहुंचाने में काफी आगे रहते हैं। इसलिए युवाओं में भी खासे लोकप्रिय है। 

16- अजीत कुमार

विस क्षेत्र:  कांटी
लड़े: 6 बार
जीते: 3 बार

जीत के कारण 
कांग्रेस, जदूयू और हम में रहे हैं। इस बार निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले बार किसी मजबूत पार्टी से चुनाव नहीं लड़ने के कारण हार का सामना करना पड़ा था। इनके जीत के कारणों में स्वजातीय मतों का मजबूत समर्थन रहा है। मंत्री के रूप में भी इनके कार्य से क्षेत्र के लोगों को लाभ मिलता रहा है। इनकी तीन बार की जीत के कारणों में चुनावी समीकरण के अलावा हवा का रुख भांपकर पाला बदलने में भी माहिर रहे हैं। लोगों को चुनाव के समय साधना है। हार और जीत दोनों स्थिति में लगातार क्षेत्र में बने रहना इनकी सबसे बड़ी खासियत है। बिजली और सड़क को लेकर अजित कुमार ने क्षेत्र में कई उल्लेखनीय कार्य किए हैं।

17- महेश्वर यादव

विस क्षेत्र: गायघाट
लड़े: आठ बार
जीते: पांच बार

जीत के कारण 
एसएसपी, दकिपा और राजद में रहे। इस बार जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहते हैं। बाढ़ के दौरान नाव से लोगों के बीच जाकर उनकी समस्या सुनते हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों में सड़क और बिजली आपूर्ति को लेकर उनकी पहल को हमेशा याद किया जाता है। इसके अलावा लोगों का काम कराने में तत्पर रहते हैं। क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के प्रति लोगों के बीच जागरूक दिखते हैं। चुनावी समीकरण का भी लाभ इनको मिलता है। स्वजातीय वोटों पर भी पकड़ है। लोगों के सुख-दुख में शामिल होते हैं। चुनावी रणनीति बनाने में कुशल हैं। लंबा राजनीतिक अनुभव भी इनके काम आता है।

18- अमरेंद्र प्रताप सिंह 

विस क्षेत्र: आरा
लड़े: पांच बार
जीते: चार बार

जीत के कारण
भोजपुर में पहली बार कमल खिलाने वाले अमरेंद्र प्रताप सिंह की पृष्ठभूमि राजनीतिक रही है। दादा हरिहर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री रहे और बड़े भाई मृगेंद्र प्रताप सिंह झारखंड सरकार में मंत्री व विधानसभा अध्यक्ष रहे। संगठन में बेहतर कार्यों को देखते हुए आरा में पहली बार भाजपा से टिकट मिला। लालू हटाओ आंदोलन की अगुआई करने के चलते आसान जीत मिल गई। फिर लगातार जीत का चौका लगाया। जनता का स्नेह अपनी जीत का प्रमुख कारण मानते हैं। भाजपा के आधार वोट और शालीन व्यक्तित्व उनकी लगातार जीत के प्रमुख कारण रहे हैं। पिछले चुनाव में कांटे के मुकाबले में हार मिली।

19- श्रीभगवान सिंह कुशवाहा

विस क्षेत्र: जगदीशपुर
लड़े: पांच बार
जीते:  चार बार

जीत के कारण
भोजपुर में आईपीएफ से राजनीति शुरू करने वाले श्रीभगवान सिंह कुशवाहा ने अपने समाज के प्रमुख नेता के रूप में पहचान बनाई है। पहली बार विधायक आईपीएफ से बने। फिर समय की नजाकत को भांपते हुए राजद और जदयू में शामिल होकर सामाजिक समीकरण व स्वजातीय वोटरों में पैठ के चलते जीत दर्ज करते रहे। बाद में लगातार दल बदलने के चलते राजनीतिक स्थिति कमजोर होती गई। लिहाजा पिछले कुछ चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा। इस बार भी जदयू से बेटिकट होने पर ऐन मौके पर लोजपा से चुनावी अखाड़े में उतर आये हैं।

20- बृजकिशोर बिंद 

विस क्षेत्र: चैनपुर (कैमूर)
लड़े: सात बार
जीते: तीन बार

जीत के कारण 
बृजकिशोर बिंद की जीत का कारण क्षेत्र का विकास, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रभाव व संगठित कार्यकर्ता है। भभुआ। चैनपुर से तीन बार लगातार जीत दर्ज कराने वाले बृजकिशोर बिंद अपने जीवन काल में आठवीं बार चुनाव मैदान किस्मत अजमाने उतरे हैं। उन्होंने बताया कि उनके प्रयास से उन किसानों के खेतों तक पानी पहुंच रहा है, जहां सिंंचाई के प्रबंध नहीं थे। किसानों की उपज बाजार में आसानी से पहुंच सके, इसके लिए सड़क बनवाई गई है। उच्च शिक्षा का बेहतर प्रबंध किया जा रहा है। 

21- रामेश्वर चौरसिया

विस क्षेत्र: सासाराम
लड़े: पांच बार
जीते:  तीन बार

जीत के कारण 
नोखा विधानसभा से पांच बार चुनाव लड़ने वाले भाजपा के फायरब्रांड नेता रामेश्वर चौरसिया इस बार सासाराम से लोजपा के टिकट पर सासाराम से चुनावी मैदान में हैं। वे नोखा से तीन बार चुनाव जीते हैं। सासाराम में वे नए प्रत्याशी है। लेकिन नोखा में किए गए कार्यों की बदौलत ही सासाराम में मतदाताओं को आकर्षिक करने में जुटे हैं। हिन्दुत्व के साथ वैश्य व सवर्ण समाज के मतों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की फिराक में हैं। 

22- राघवेंद्र प्रताप सिंह 

विस क्षेत्र: बड़हरा
लड़े: दस बार
जीते: छह बार

जीत के कारण 
पहली बार चुनाव जीत राघवेंद्र प्रताप सिंह ने अपने स्वतंत्रता सेनानी पिता की राजनीतिक विरासत संभाली। भोजपुर के चित्तौढ़गढ़ के रूप में चर्चित इस क्षेत्र में राघवेंद्र प्रताप की पहचान प्रभावशाली प्रतिनिधि की बनी और उन्हें मंत्री पद की जिम्मेवारी भी मिली। क्षेत्र में किये गये कार्यों के अलावा राजद के सामाजिक समीकरण व स्वजातीय वोटरों में गहरी पैठ का लाभ मिलता रहा। इससे उनकी जीत होती रही। हालांकि, पिछले विस चुनाव में बेटिकट होने पर करारी हार का भी सामना करना पड़ा।

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23- बनवारी राम

विस क्षेत्र: रजौली
लड़े: दस बार
जीते: चार बार

जीत के कारण 
बनवारी राम 11वीं बार चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस, लोजपा, जेएनपी, भाजपा के टिकटधारी और निर्दलीय रूप में वह वर्तमान में भी अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। यानी येन-केन-प्रकारेण अपनी आजमाइश जारी रखने वाले बनवारी राम ने 1972 से चुनाव लड़ने की शुरुआत की थी। चार बार उन्हें सफलता भी मिल चुकी है। किसी भी हार से वह कभी डिगे नहीं और हमेशा नई रणनीति व पूर्व से ज्यादा जोश के साथ चुनावी मैदान में उतरते रहे हैं। इस चुनाव में भाजपा से अपने पुराने रिश्ते को भुनाने की कोशिश में लगे रहे लेकिन टिकट कन्हैया कुमार को मिल जाने के बाद निर्दलीय ही चुनाव मैदान में डटे हैं। बनवारी राम की सफलता उनकी व्यक्तिगत छवि तथा सामाजिक पकड़ के इर्द-गिर्द घूमती है। एक मनोहारी, सबके सुख-दु:ख के साथी और घरेलू व्यक्ति की उनकी छवि हमेशा उनकी सफलता के मार्ग को प्रशस्त करती रही है। स्वजातीय वोट पर उनकी पकड़ भी उनकी शक्ति है।

24- रामाधार सिंह  

विस क्षेत्र: औरंगाबाद
लड़े: पांच बार
जीते: तीन बार

जीत के कारण 
किसानों के लिए लड़ाके की भूमिका में रहत हैं रामाधार सिंह। औरंगाबाद विधानसभा क्षेत्र के छोटे से गांव सोखेया से आने वाले पूर्व मंत्री रामाधार सिंह ने किसानों के लिए लड़ाई लड़ी। जो बाद में भी इतनी प्रभावी हुई कि भाजपा के टिकट पर उनका सिक्का जम गया। औरंगाबाद जिले र्में ंसचाई के मुद्दे पर रामाधार सिंह ने संघर्ष शुरू किया और बाद में जनता की पसंद बन गए। मुखर तरीके से आवाज उठाने और ठेठ गंवई भाषा में सभा को संबोधित करने के कारण वे लोगों के बीच पैठ बनाने में सफल रहे। तीन बार उन्होंने औरंगाबाद विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और बिहार सरकार में सहकारिता मंत्री भी बने। वर्ष 2010 के चुनाव में जीतने पर उन्हें मंत्री बनाया गया था। भाजपा के संघर्ष के दिनों में रामाधार सिंह औरंगाबाद में पार्टी का झंडा बुलंद करते रहे। औरंगाबाद विधानसभा क्षेत्र से पांच बार भाजपा के टिकट पर लड़े। तीन बार जीते और दो बार हारे।

25- संतोष कुमार निराला 

विस क्षेत्र: राजपुर
लड़े: पांच बार
जीते: दो बार

जीत के कारण 
राजपुर विस से पांचवीं बार चुनाव में उतरे दो बार जीत चुके हैं। फिर से चुनाव मैदान में है जदयू की टिकट पर इसबार के चुनाव को रोचक बना दिया है। दो बार से चुनाव जीतने का कारण इनका मृद़ुभाषी स्वभाव और मिलनसार छवि है। विकास कार्यों को भी इन्होंने अपना लक्ष्य मानकार कार्य किया। बराबर जनता से भी संपर्क बनाए रहे।  इनके राजनीतिक समीकरण के कारण भी जीत हुई। इसके अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम भी इनकी जीत में सहायक साबित होता रहा है।

26- ददन पहलवान

विस क्षेत्र: डुमरांव
लड़े: छह बार
जीते: चार बार

जीत के कारण 
ददन पहलवान,  डुमरांव विधानसभा क्षेत्र से छह बार चुनाव में उतरे और चार बार जीत दर्ज की है। इस बार निर्दलीय डुमरांव से चुनाव मैदान में हैं। इनके जीतने का कारण क्षेत्र का चुनावी समीकरण रहा है। हालांकि चार बार अपनी जीत का कारण विधायक विकास कार्य को लेकर किया गया। बराबर जनता से संपर्क बनाए रहे। गांव- देहात में भी अपनी छवि को लेकर सचेत रहे। अगर पार्टी ने टिकट नहीं भी दिया तो भी अपनी छवि व काम को लेकर बराबर जनता के पास जाते रहे।

27- संजय कुमार तिवारी

विस क्षेत्र: बक्सर
लड़े: पांच बार
जीते: एक बार

जीत के कारण 
संजय कुमार तिवारी उर्फ मुन्ना तिवारी विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। ये कुल पांच बार विधानसभा चुनाव में उतरे और एक बार जीत दर्ज की। इसबार कांग्रेस से चुनाव में बक्सर सीट से उम्मीदवार हैं। इनकी जीत का कारण राजनीतिक व जातीय समीकरण है जो मुख्य रूप से काम करता है। इसके अलावा ये बराबर क्षेत्र में जनता से संपर्क बनाए रहते हैं। शहर में विकास कार्य को भी तेजी से कराने में अपनी सहभागिता दिखायी है। इससे भी लाभ मिलता है।

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